पितृपक्ष / श्राद्ध के नियम
पितृ (पूर्वज)
पितृपक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के 16 दिन हैं, जिनमें पूर्वजों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध किया जाता है। जिस तिथि को पूर्वज का देहांत हुआ हो, उसी तिथि पर श्राद्ध करते हैं; तिथि न पता हो तो सर्वपितृ अमावस्या पर। (उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में इसे आश्विन कृष्ण पक्ष कहते हैं।)
नियम
- समय: श्राद्ध दोपहर के कुतप काल में करें — दिन का आठवाँ मुहूर्त, लगभग 11:30 से 12:30 के बीच (सटीक समय पंचांग में देखें)।
- तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा, काले तिल, जल और थोड़े दूध से जलांजलि दें।
- पंचबली: भोजन परोसने से पहले पाँच अंश निकालें — गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी के लिए।
- पिंडदान: चावल/जौ और तिल से पिंड बनाएँ; सात्त्विक भोजन (खीर-पूरी) कराकर दक्षिणा दें।
- परंपरा में माता के श्राद्ध के लिए मातृ नवमी और अज्ञात तिथि के लिए सर्वपितृ अमावस्या विशेष मानी जाती हैं।
पूजन सामग्री
कुशा, काले तिल, जौ/चावल, जल, दूध, तांबे का पात्र, सात्त्विक भोजन (खीर-पूरी), दक्षिणा।
पूजा विधि
- स्नान कर संकल्प लें और अपने पितरों का नाम-गोत्र सहित स्मरण करें।
- कुतप काल में दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करें।
- पिंड बनाकर अर्पित करें।
- पंचबली के अंश निकालकर गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी को दें।
- ब्राह्मण/ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और दक्षिणा दें; फिर परिवार सहित प्रसाद ग्रहण करें।
मंत्र
ॐ पितृ देवाय नमः
श्राद्ध की विधि परिवार, गोत्र और क्षेत्र की परंपरा से बदलती है। गया, हरिद्वार और प्रयाग जैसे तीर्थों में पिंडदान का विशेष महत्त्व माना जाता है। पक्की विधि के लिए अपने कुल-पुरोहित से पूछें।