प्रदोष व्रत

भगवान शिव

हर पक्ष की त्रयोदशी को प्रदोष व्रत होता है (महीने में दो बार)। सूर्यास्त के आसपास की संध्या का समय प्रदोष काल कहलाता है और उसी में शिव पूजा की जाती है। वार के अनुसार इसे सोम प्रदोष, भौम प्रदोष, शनि प्रदोष आदि कहते हैं।

नियम

  • दिन में उपवास रखें (फल/जल या अपनी क्षमता के अनुसार)।
  • शाम की पूजा से पहले स्नान करें और स्वच्छ, हल्के रंग के वस्त्र पहनें।
  • पूजा सूर्यास्त के आसपास, प्रदोष काल में करें (सटीक समय के लिए पंचांग देखें)।

पूजन सामग्री

शिवलिंग या शिव-परिवार का चित्र, जल, दूध, दही, घी, शहद, गंगा-जल, बेलपत्र, सफ़ेद फूल, भस्म/चंदन, धूप-दीप, फल।

पूजा विधि

  1. दिन भर उपवास रखकर शाम को स्नान करें और पूजा-स्थान साफ़ करें।
  2. प्रदोष काल में शिवलिंग का जल, दूध, दही, घी, शहद से अभिषेक करें, फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
  3. बेलपत्र, सफ़ेद फूल, चंदन/भस्म और धूप-दीप अर्पित करें।
  4. “ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जप करें।
  5. प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें या सुनें।
  6. शिव आरती (ॐ जय शिव ओंकारा) करें। परिक्रमा परंपरा से आधी की जाती है — जलहरी (गौमुख) को लाँघा नहीं जाता।
  7. प्रसाद बाँटकर सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें।

पारण (व्रत खोलना)

पूजा और आरती के बाद उसी शाम सात्त्विक भोजन से व्रत खोला जाता है।

मंत्र
ॐ नमः शिवाय

कथा — प्रदोष व्रत की कथा

स्कंद पुराण की कथा के अनुसार एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा से जीवन चलाती थी। एक दिन उसे विदर्भ का एक राजकुमार धर्मगुप्त मिला, जिसके पिता को शत्रुओं ने मार दिया था। ब्राह्मणी ने उसे अपने पुत्र की तरह रखा।

शांडिल्य ऋषि की सलाह पर उन्होंने प्रदोष व्रत करना शुरू किया। कुछ समय बाद राजकुमार की भेंट गंधर्व कन्या अंशुमती से हुई और गंधर्वराज की सहायता से उसने अपना राज्य वापस पाया। उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना मंत्री बनाया।

कथा की सीख है कि श्रद्धा से किया गया प्रदोष व्रत कठिन समय में संबल देता है। प्रदोष के पीछे समुद्र-मंथन की मान्यता भी है — हलाहल विष पीने के बाद देवताओं ने शिव जी की स्तुति संध्या में की थी।

परंपरागत कथा का संक्षिप्त पुनःकथन; अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में रूप थोड़ा भिन्न मिलता है।

प्रदोष का दिन तिथि के त्रयोदशी में सूर्यास्त के समय होने से तय होता है; कभी-कभी वह दो दिनों की तिथि में आती है — पंचांग से पुष्टि करें।

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