दशहरा (विजयादशमी)
आश्विन शुक्ल दशमी
तिथि और समय
पूजा का समय अपराह्न (दोपहर के बाद) माना जाता है; रावण दहन सूर्यास्त के बाद होता है।
महत्त्व
दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। मान्यता है कि इस दिन श्रीराम ने रावण का वध किया और देवी दुर्गा ने महिषासुर का। नवरात्रि के बाद आने वाले इस दिन को नए कार्य के आरंभ, शस्त्र-पूजन और अपराजिता-पूजन के लिए शुभ माना जाता है।
पूजा सामग्री
अपराजिता या शमी के पत्ते, फूल, अक्षत, रोली, दीपक, मिठाई, फल, पूजन की जाने वाली वस्तुएँ (औज़ार/बही/वाहन)
पूजा विधि
- घर और पूजा-स्थान की सफ़ाई करके स्नान करें और साफ़ वस्त्र पहनें।
- अपराह्न में पूजा-स्थल पर देवी अपराजिता का स्मरण करें; कई परंपराओं में अष्टदल कमल बनाकर उसकी पूजा की जाती है।
- शमी वृक्ष या उसके पत्तों की पूजा करें। महाराष्ट्र-कर्नाटक में शमी/आपटा के पत्ते “सोना” कहकर बड़ों को दिए जाते हैं।
- शस्त्र, औज़ार, वाहन या बही-खातों का पूजन करें और उन पर रोली-अक्षत-फूल चढ़ाएँ।
- श्रीराम और माँ दुर्गा का ध्यान करके आरती करें और प्रसाद बाँटें।
- सूर्यास्त के बाद रावण दहन देखने या दीप जलाने की परंपरा है।
ॐ दुर्गायै नमः
कथा
प्रचलित कथा के अनुसार रावण द्वारा सीता जी का हरण होने पर श्रीराम ने वानर सेना के साथ लंका पर चढ़ाई की और दशमी के दिन रावण का वध किया। इसी तिथि को देवी दुर्गा द्वारा नौ दिन के युद्ध के बाद महिषासुर के वध की मान्यता भी जुड़ी है। महाभारत की परंपरा में पांडवों ने अज्ञातवास के बाद शमी वृक्ष से अपने शस्त्र लौटाए, इसलिए शमी-पूजन होता है।
यह प्रचलित परंपरा के आधार पर लिखी संक्षिप्त कथा और विधि है। क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार रीति-रिवाज बदल सकते हैं; अपनी परंपरा या पंडित जी के निर्देश को प्राथमिकता दें। तिथि दिल्ली के लिए गणना की गई है।