छठ पूजा
कार्तिक शुक्ल षष्ठी (चार दिन)
तिथि और समय
चार दिन का क्रम — 2026
स्नान के बाद शुद्ध भोजन (प्रायः कद्दू-भात और चने की दाल) ग्रहण किया जाता है।
दिन भर निर्जला उपवास; शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर पूजा के बाद ग्रहण किया जाता है।
सूप में ठेकुआ, फल, गन्ना और अन्य प्रसाद सजाकर घाट पर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण होता है और प्रसाद ग्रहण करके पारण किया जाता है।
महत्त्व
छठ सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का चार दिवसीय पर्व है, जो विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई में मनाया जाता है। व्रती लगभग 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं और नदी या तालाब के किनारे डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह पर्व स्वच्छता, संयम और कृतज्ञता का प्रतीक है।
पूजा सामग्री
बाँस का सूप और दौरा, ठेकुआ, मौसमी फल, गन्ना, नारियल, केला, सिंदूर, दीपक, जल का लोटा, नए/साफ़ वस्त्र
पूजा विधि
- चारों दिन घर और रसोई की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है; प्रसाद शुद्ध घी/गुड़ से और अलग चूल्हे पर बनाया जाता है।
- नहाय-खाय के दिन स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
- खरना की शाम पूजा के बाद ही व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं; इसके बाद निर्जला व्रत आरंभ होता है।
- संध्या अर्घ्य के लिए परिवार सहित घाट पर जाएँ; सूप में प्रसाद सजाकर जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य दें और छठी मैया के गीत गाएँ।
- अगली सुबह उषा अर्घ्य देकर पूजा पूरी करें और प्रसाद बाँटकर पारण करें।
ॐ सूर्याय नमः
कथा
स्कंद पुराण से जुड़ी प्रचलित कथा में राजा प्रियव्रत और रानी मालिनी संतानहीन थे। महर्षि कश्यप के यज्ञ से हुई खीर खाने पर रानी को पुत्र हुआ, पर वह मृत जन्मा। राजा शोक में प्राण त्यागने लगे तो देवी षष्ठी प्रकट हुईं, जिन्हें सृष्टि की छठी देवी कहा जाता है। उनकी कृपा से बालक जीवित हो गया। तब से षष्ठी देवी (छठी मैया) की पूजा की परंपरा चली। अन्य परंपराओं में इसे द्रौपदी, कुंती और सीता जी द्वारा सूर्य-उपासना से भी जोड़ा जाता है।
36 घंटे का निर्जला उपवास कठिन है। स्वास्थ्य की स्थिति देखकर ही व्रत रखें; बीमार, गर्भवती या वृद्ध जन डॉक्टर और परिवार के बड़ों की सलाह लें। जल में अर्घ्य देते समय सुरक्षा का ध्यान रखें।
यह प्रचलित परंपरा के आधार पर लिखी संक्षिप्त कथा और विधि है। क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार रीति-रिवाज बदल सकते हैं; अपनी परंपरा या पंडित जी के निर्देश को प्राथमिकता दें। तिथि दिल्ली के लिए गणना की गई है।